
लोकतंत्र के इस मंदिर पर,घिरे अभी तमतोम
हापुड, सीमन (ehapurnews.com):हिन्दी साहित्य परिषद हापुड़ के तत्वावधान में दीपावली पर्व पर एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध गीत एवं ग़ज़लकार प्रेम ‘निर्मल’ ने की, जबकि मंच संचालन साहित्यकार एवं कवि डॉ. अनिल बाजपेयी ने किया।
कवि प्रेम ‘निर्मल’ ने लोकतंत्र की वर्तमान परिस्थितियों और दीपावली के वास्तविक संदेश को अपनी रचना में स्वर देते हुए पढ़ा—
“लोकतंत्र के इस मंदिर पर, घिरे अभी तमतोम। आतंकित है इनसे वसुधा, है आतंकित व्योम। लाने हैं दमदार उजाले, हो मंदिर उजला। दीपावली मनाओ रे मन! दीप से दीप जला।।”
मंच संचालन करते हुए डॉ. अनिल बाजपेयी ने दीपावली के संदेश को अपनी भावपूर्ण पंक्तियों में कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया—
“रात गई तो फिर हुआ, सूरज का दीदार, दीवाली सिखला गई, तम पर जीत अपार।
रात अँधेरी हो भले, मन में रहे उजास, चेहरे पर सबके खिले, खुशियों का मधुमास।”
सुनीता स्वामी ने जीवन के सुख-दुःख, संघर्ष और सकारात्मक सोच का संदेश देते हुए कहा—
“सुख-दुःख तो जीवन के साथी हैं, इससे कभी घबराना नहीं। आज अगर आँखों में आँसू हैं, तो कल मुस्कुराना है, यह कभी भूल जाना नहीं। मुश्किल आए तो हिम्मत रखना, अपने मन में विश्वास रखना।”
पं. शिव प्रकाश ‘शिव’ ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों, मनुष्य के दोहरे चरित्र और मन में पनपती नफरत पर कटाक्ष करते हुए पढ़ा—
“आशाओं पर ग्रहण है, सपनों पर पहरा लगा हुआ, भरा नहीं वो ज़ख्म अभी, जो दिल पर गहरा लगा हुआ। होंठों पर मुस्कान है, लेकिन नफ़रत दिल में भरी हुई, अब भी उनके चेहरे पर, एक और चेहरा लगा हुआ।”
शहवार नवेद ने शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की स्थिति पर अपनी रचना के माध्यम से गंभीर सवाल उठाए—
“जितने भी थे हार छिन गए, शिक्षक के अधिकार छिन गए। भूली-बिसरी हुई किताबें, गीता और कुरआन छिन गए।
मूक हुए हैं सारे शिक्षक, डंडे के सब यार छिन गए। शिक्षा नीति बदल रही है, सब शिक्षक के प्यार छिन गए।।”
महावीर वर्मा ‘मधुर’ ने मानवता, करुणा और सामाजिक सद्भाव का संदेश देते हुए कहा—
“मानवता करती यहाँ, सबसे यही पुकार, दीन, दुखी व उपेक्षित से, करो सभी से प्यार।”
गरिमा त्यागी ने श्रम की महत्ता को रेखांकित करते हुए दोहा पढ़ा-
“श्रम से ही रोटी मिले, कहते ज्ञानी लोग, श्रम बिन जीवन में सदा, प्राणी पाए रोग।।”
वर्षा जैन ने लोकतंत्र में सही जनप्रतिनिधि चुनने की आवश्यकता पर अपनी कविता प्रस्तुत की—
“हो चुनाव जब भी भारत में, नेता चुनो विशाल। जुमलेबाज़ी करने वाला, हो न किसी भी हाल।।”
आचार्य अभयराज शास्त्री ने आत्मविश्वास, ममता और नारी शक्ति का परिचय देते हुए अपनी ओजपूर्ण पंक्तियाँ पढ़ीं—
“सोच बदलिये दुनिया वालो, मैं अब सब पर ही भारी। साकार मूर्ति मैं ममता की, किन्तु दुष्टों को चिंगारी।
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