हापुड़, सीमन (ehapurnews.com): पतित पावनी माँ गंगा के आविर्भाव की कई पौराणिक कथाएँ मिलती है परन्तु इसमें से दो कहानी प्रचलित है जिसमें बैसाख शुक्ल सप्तमी तिथि माँ गंगा के पुनर्जन्म के रुप में प्रसिद्ध है जो इस बार 14 मई दिन मंगलवार को है। इस दिन गंगा स्नान करने व दूध की धार चढ़ाने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। ज्योतिषी के0 सी0 पाण्डेय काशी वाले के अध्यक्ष भारतीय ज्योतिष कर्मकांड महासभा (रजि0) ने बताया कि माँ गंगा को वस्त्र (साड़ी) भी चढ़ाना चाहिए। पितरों के नाम से गंगा स्नान व श्राद्ध करने से पितरों को भी तृप्ति होती है, आशीर्वाद मिलता है। पुराणों के अनुसार इस दिन गंगा जान्हू ऋषि के कान से निकली, इसलिए जान्हवी कहलाई।
एक अन्य कथा देवी पुराण के अनुसार राजर्षि भगीरथ जी ज़ब तपस्या के बाद गंगा जी को पृथ्वी पर ला रहे थे तो भूलवश रास्ते में जान्हू ऋषि के आश्रम से भी निकली। उस समय ऋषि यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी के वेग से आश्रम की समस्त सामग्री बह गयी जिससे क्रोधित होकर उन्होंने गंगाजी को पी लिया। इससे चिंतित राजा भगीरथ व अन्य ऋषियों के प्रार्थना पर ऋषि ने उन्हें छोड़ दिया। गंगा जान्हू ऋषि के जंघा से निकली अतः जान्हवी कहलाई। ब्रह्मपुराण व धर्म सिंधु के अनुसार ये घटना बैसाख शुक्ल पक्ष सप्तमी को मध्यान्ह बेला में हुई थी। इसीलिए इसे गंगासप्तमी कहते है।
इस दिन माँ गंगा का पूजन जान्हवी नाम से व जान्हवी नाम स्मरण करने से कष्टों से मुक्ति मिलता है। सप्तमी तिथि पूरे दिन प्राप्त होने से पूरे दिन फल प्राप्त होगा। सुबह 7.25 से वृद्धि योग के साथ दोपहर एक बजकर 05 मिनट तक पुष्य नक्षत्र होने से इस समय में स्नान -पूजन का अधिक शुभ फल प्राप्त होगा। पुनः सायंकाल 5.55 पर सूर्य के वृषभ राशि में संक्रांति होने साथ ही सर्वार्थसिद्धि योग होने से इस समयकाल में भी स्नान,पूजन व आरती करने से मनोवांक्षित फल प्राप्त होगा।

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