
अपनों की तलाश में भटकती रहीं आंखें, गंगा में विसर्जित हुईं 3887 लावारिसों लोगों की अस्थियां
हापुड़, सीमन (ehapurnews.com):क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया से जाने के बाद अगर किसी का अपना न हो, तो उसका क्या होता है? पितृपक्ष के मौके पर ब्रजघाट से एक बेहद भावुक करने वाली खबर सामने आई है, जहाँ उन 3887 लावारिस लोगों को मोक्ष दिलाया गया, जिन्हें दुनिया में मरणोपरांत कंधा या मुखाग्नि तक नसीब नहीं हुई थी।
गढ़मुक्तेश्वर की तीर्थ नगरी ब्रजघाट की पावन गंगा धारा रविवार को एक ऐसे दृश्य की गवाह बनी, जिसने वहां मौजूद हर शख्स की आंख नम कर दी। दिल्ली के निगम बोध घाट, पंजाबी बाग समेत कई श्मशान घाटों पर लंबे समय से लावारिस रखी गई 3887 अस्थियों को एक सामाजिक संस्था द्वारा एकत्र किया गया।
इन अस्थियों को ब्रजघाट लाकर तीर्थ पुरोहितों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से पूजा की गई और फिर मां गंगा की गोद में प्रवाहित कर दिया गया। इस दौरान पूरा वातावरण श्रद्धांजलि और भावुकता से भर गया।
संस्था के पदाधिकारियों का कहना है कि जिनका इस दुनिया में कोई नहीं होता, उनके लिए समाज ही परिवार है। पितृपक्ष में किए गए इस पुण्य कार्य का उद्देश्य यह संदेश देना है कि भले ही किसी का अपना परिवार न हो, लेकिन मानवता का परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रह सकता है। भले ही इन चेहरों की अंतिम यात्रा में कोई अपना शामिल न हुआ हो, लेकिन इस नेक पहल ने साबित कर दिया कि मानवता ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा है।




















