एसीएफ की तैयारी में जुटा क्षय रोग विभाग
एसडीए चर्च और बौद्ध मठ में धर्मगुरुओं से मिल उन्हें किया आमंत्रित
हापुड़, सीमन (ehapurnews.com): शासन से एक्टिव केस फाइंडिंग (एसीएफ) अभियान चलाने के आदेश मिलने के बाद जिला क्षय रोग विभाग तैयारियों में जुट गया है। जिला क्षय रोग अधिकारी (डीटीओ) डा. राजेश कुमार सिंह ने बताया- धार्मिक गुरुओं के सहयोग से आमजन को क्षय रोग के प्रति जागरूक किया जाएगा। इसी उद्देश्य से दो मार्च को प्रातः 10 बजे दस्तोई रोड स्थित जिला क्षय रोग केंद्र पर धर्मगुरुओं की बैठक बुलाई गई है। इस संबंध में शनिवार को जिला क्षय रोग विभाग की टीम डीटीओ के निर्देशन और जिला पीपीएम कोर्डिनेटर सुशील चौधरी के नेतृत्व में मेरठ रोड स्थित रठ्ठापाला बौद्ध मठ और एसडीए चर्च पहुंची और धर्मगुरुओं से बैठक में शामिल होने का आग्रह किया।
पीपीएम कोर्डिनेटर सुशील चौधरी ने बताया – मेरठ रोड स्थित एसडीए चर्च में फादर सतीश और सुरेंद्र ने एसीएफ के दौरान पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया और साथ ही प्रार्थना सभा के दौरान लोगों को क्षय रोग के लक्षणों के संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि लक्षण आने पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर टीबी की निशुल्क जांच कराएं। उन्होंने बताया टीबी की पुष्टि होने पर सरकार की ओर से न केवल निशुल्क उपचार किया जाता है बल्कि उपचार जारी रहने के दौरान बेहतर पोषण के लिए निक्षय पोषण योजना के तहत हर माह पांच सौ रुपए का भुगतान रोगी के बैंक खाते में किया जाता है। जिला पीपीएम कोर्डिनेटर ने इस मौके पर कहा- क्षय रोग से अब घबराने की नहीं बल्कि समय रहते जांच और उपचार कराने की जरूरत है। नियमित उपचार के बाद टीबी पूरी तरह ठीक हो जाती है।
रठ्ठा पाला बौद्ध मठ के मुखिया भंते एल. आशुतोष की ओर से भी क्षय रोग के बारे में संवेदीकरण के साथ क्षय रोग विभाग को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है। डीटीओ डा. राजेश सिंह ने बताया जल्द ही मदरसों, मंदिरों और गुरुद्वारों में भी संपर्क कर दो मार्च को धर्मगुरुओं की बैठक में आने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। बता दें कि शासन के निर्देश पर नौ से 22 मार्च तक जनपद में एसीएफ अभियान चलाया जाएगा। कैंपेन के दौरान स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर टीबी के लक्षणों की जानकारी देंगी और मिलते-जुलते लक्षण वालों की टीबी की जांच कराएंगी। पहली बार शासन ने एसीएफ के दौरान 20 फीसदी आबादी की स्क्रीनिंग के निर्देश दिए हैं। अब तक एसीएफ में केवल 10 फीसदी आबादी की स्क्रीनिंग की जाती थी।





























