
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व हर्षण व वज्र के साथ जयंती नामक शुभ योग में 4 सितम्बर शुक्रवार को मनाई जाएगी
हापुड़, सीमन (ehapurnews.com): श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व हर्षण व वज्र के साथ जयंती नामक शुभ योग में 4 सितम्बर शुक्रवार को मनाया जाएगा सभी धर्मावलम्बी (स्मार्त व वैष्णव ) इसी दिन निर्जला अथवा सजला व्रत करेंगे भारतीय ज्योतिष कर्मकांड महासभा अध्यक्ष ज्योतिर्विद पं0 के0 सी0 पाण्डेय काशी वाले ने श्रीमदभागवत, महाभारत, भविष्य पुराण, अग्नि पुराण, निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु आदि धर्मग्रंथों के श्लोक उदाहरण देते हुए बताया कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद महीने के कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को मध्य रात्रि रोहिणी नक्षत्र में हुआ था इस बार भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि 3 सितम्बर की देर रात्रि 2.25 बजे से प्रारम्भ होकर 4 सितंबर शुक्रवार को देररात्रि 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगा तथा रोहिणी नक्षत्र 3 सितंबर की रात्रि 12.29 बजे से प्रारम्भ होकर 4 सितंबर को देर रात्रि 11.04 बजे तक रहेगा सूर्योदय से लेकर अर्धरात्रि तक तिथि नक्षत्र योग मिलने से 04 सितंबर को जन्माष्टमी व्रत के साथ भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप का पूजन किया जाएगा पंडित के सी पाण्डेय ने भविष्यपुराण के अनुसार बताया कि अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयन्ती’ नाम से कही जाती है इसी प्रकार कृष्णाष्टम्यां भवेद्यत्र कलैका रोहिणी यदि। जयन्ती नाम सा प्रोक्ता उपोष्या सा प्रयत्नतः।। अर्थात कृष्णपक्ष की अष्टमी (जन्माष्टमी) में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयन्ती नाम से कहा जाता है अतः इसी तिथि में प्रयत्न से सभी को उपवास (व्रत) करना चाहिये, अग्निपुराण के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी को उपवास रखकर भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करने से मनुष्य सात जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त हो जाता है ॥ तथा विष्णुधर्म में कहा गया है कि “रोहिण्यामर्धरात्रे च यदा कृष्णाष्टमी भवेत्, तस्यामभ्यर्चनं शौरेर्हन्ति पापं त्रिजन्मजम् ” अर्थात आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी (जन्माष्टमी) हो तो उसमें कृष्ण अर्चन (पूजन) करने से तीन जन्म के पापों का हनन होता है अर्थात समाप्त हो जाता है साथ ही उन्होंने निर्णयसिंधु श्लोक “त्रेतायां द्वापरे चैव राजन् कृतयुगे तथा। रोहिणीसहिता चेयं विद्वद्भिः समुपोषिता ।।अर्थात त्रेता, द्वापर तथा सतयुग में रोहिणी के सहित अष्टमी में ही विद्वानों ने उपवास किया का उदाहरण देते हुए 4 सितम्बर को जन्माष्टमी व्रत शास्त्रसम्मत बताया. कान्हा जी को पीला व नीला रंग बहुत प्रिय है, मोरपँखयुक्त मुकुट के साथ अत्यंत प्रिय बांसुरी भी अवश्य भेंट करें तथा मिश्रीयुक्त माखन का भोग लगाना चाहिए साथ ही अन्य सफ़ेद व पीले रंग के मिष्ठान का भोग अर्पित करें जन्माष्टमी मुख्य पूजन के लिए 4 सितम्बर को रात्रि 11.54 बजे से 12.42 बजेतक स्थिर लग्न, शुभ चौघड़िया, वज्र योग के साथ श्रेष्ठ है तथा व्रत का पारण पूजन उपरांत तिथि नक्षत्र की समाप्ति पर किया जा सकता है 05 सितम्बर शनिवार को नन्दोत्सव (दहीहांडी) मनाया जाएगा.
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