नवरात्रि स्पेशल: अश्विनी नक्षत्र में करें कलश की स्थापना












हापुड, सीमन (ehapurnews.com): चैत्र नवरात्रि भक्ति के साथ आध्यात्मिक, ज्योतिषीय व वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत्सर 2081 का शुभारम्भ 9 अप्रैल 2024 दिन मंगलवार को हो रहा है। ब्रह्मपुराण के अनुसार इसी दिन सूर्योदय के समय में ब्रह्मा जी ने संसार की रचना की। इस वर्ष का राजा मंगल व सेनापति शनि रहेंगे तथा वर्ष का नाम काल होगा, हिन्दू नववर्ष के साथ देवी पूजन उपासना के प्रमुख पर्व चैत्र नवरात्रि की शुरुआत भी इस बार 9 अप्रैल से है। भारतीय ज्योतिष-कर्मकांड महासभा(रजि0) के अध्यक्ष एस्ट्रो के. सी. पाण्डेय काशी वाले ने बताया कि चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन मत्स्य अवतार तथा नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म रामनवमी मनाया जाता है। उपवास व हवन द्वारा द्वारा मौसम परिवर्तन के कारण होने वाले रोगों की मुक्ति के लिए भी वैज्ञानिक कारण है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के 9 स्वरूपों प्रथम दिन माँ शैलपुत्री से क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंद माता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री देवी के पूजन के साथ इस त्यौहार का समापन। 18 अप्रैल दिन गुरुवार को दशमी तिथि को व्रत पारण के साथ होगा। नवरात्रि की शुरुआत सर्वार्थसिद्धि योग व अमृतसिद्धि योग के साथ भद्रा दोष भी ना होने के कारण अत्यंत शुभफल प्रदान करने वाला होगा, कलश (घट) स्थापना के लिए अश्विनी नक्षत्र में सुबह 9.52 से दोपहर 1.56 तक समय सही है। स्थापना के लिए सुबह का समय अधिक शुभ रहेगा
घट स्थापना विशेष शुभ मुहूर्त :-
सुबह 7.52से 09.46 स्थिर लग्न, सर्वार्थसिद्धि योग व अमृत सिद्धि योग दोपहर 11.55 से 12.45 अभिजीत मुहूर्त, सर्वार्थसिद्धि योग व अमृतसिद्धि योग तथा लाभ-अमृत चौघड़िया लगभग सभी जानते है कि माँ दुर्गा की सवारी सिंह है लेकिन देवी भागवत पुराण में वर्णन है कि नवरात्रि में दिन के अनुसार माँ का आगमन व प्रस्थान अलग अलग वाहन पर होता है वर्णित श्लोक-
शशिसूर्ये गज़रूढ़ा शशिभौमे तुरंगमे|
गुरौशुक्रेच दौलयां बुधे नौका प्रकीर्तिता.
के अनुसार इस बार नवरात्र मंगलवार से शुरू होने के कारण माता का आगमन घोड़े की सवारी पर होगा जो युद्ध, आपदा व राजनैतिक उथल पुथल का संकेत देता है माता का प्रस्थान हाथी पर होगा जो आने वाले समय में अच्छी वर्षा का संकेत है. देवी भागवत पुराण व दुर्गासप्तसती में पुरे 9 दिन अलग अलग वस्तुओं से भी पूजन का विधान कहा गया है घट स्थापना के लिए मिट्टी का घड़ा उत्तम रहता है स्थापना व पूजन के लिए कलश के साथ पंचपल्लव या आम के पत्ते का पल्लव,नारियल,कलावा,रोली,सुपारी,गंगाजल, सिक्का,दूर्वा,गेहूं और अक्षत(चावल), हल्दी,पान के पत्ते, कपूर,लौंग, जावित्री,इलायची,धुप, देशी घी,गाय का दूध,जोतबत्ती, हवन सामग्री,श्रृंगार का सामान,फल, मिष्ठान आदि सामान की आवश्यकता होती है.कलश स्थापना करने वाले को दुर्गासप्तसती का नित्य पाठ स्वयं या योग्य ब्राह्मण से करवाना चाहिए पुरे 9 दिन तक व्रत अवश्य करना चाहिए प्रतिदिन एक कन्या को खिलाते हुए वृद्धि करते हुए 9वे दिन नौ कन्याओं को खिलाना चाहिए अगर ये संभव ना हो तो नवमी को 9 कुमारी कन्या का पूजन कर भोजन कराये, धर्मग्रंथो के अनुसार कन्या की उम्र 2 वर्ष से कम या दस वर्ष से अधिक नही होना चाहिए कन्याओं के क्रम से नाम कुमारिका, त्रिमूर्ति,कल्याणी,रोहिणी, काली, चंडीका, शाम्भवी, दुर्गा तथा सुभद्रा के पूजन फल प्राप्त जानना चाहिए व हवन करें मंत्र “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्र व नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:,नम: प्रकृत्यै भदायै नियता: प्रणता: स्मताम्।। से हवन करें तथा दशमी तिथि में व्रत पारण करना चाहिए तभी पूर्ण शुभ फल की प्राप्ति होती है जो लोग 9 दिन का व्रत नही कर सकते है वो श्रद्धा भाव से प्रथम दिन व अष्टमी के दिन अथवा सप्तमी, अष्टमी व नवमी तीन दिन का व्रत रख कर माँ की कृपा प्राप्त कर सकते है संसार में शक्ति की उपासना सर्वत्र होती है वेद, उपनिषद और गीता में भी शक्ति को प्रकृति कहा गया है प्रकृति में ही जन्म व सृजन की शक्ति है जिसके पास शक्ति नहीं है वो दुःखमय जीवन व्यतीत करते है, शक्ति ही सृजन व विध्वंस दोनों का कारक है धर्मग्रंथो के अनुसार शक्ति के स्पंदन से ही तीनों ब्रह्मा, विष्णु व महेश. ब्रह्मा अर्थात सृजनकर्ता, विष्णु अर्थात पालनकर्ता व शिव अर्थात संहारकर्ता से सृष्टि संचालित है,दुर्गासप्तसती में वर्णित “दुर्गा दुर्गति नाशिनी” अर्थात माँ दुर्गा दुःख व दुर्गति का नाश करने वाली है इसी प्रकार या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता कहते हुए उपासना की गई है माँ दुर्गा की आराधना-पूजा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है सभी को हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत 2081 व चैत्र नवरात्रि की शुभकामनायें.


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