अध्यापकों को दी गई आरबीएसके- आरकेएसके की जानकारी
– जेएमएस वर्ल्ड स्कूल के सभागार में जुटे हापुड़ ब्लॉक के करीब 300 प्रधान अध्यापक
– कार्यक्रम में जिला पीपीएम समन्वयक ने टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के बारे में बताया
हापुड़, सीमन (ehapurnews.com): हापुड़, 29 अगस्त, 2023। शिक्षा विभाग के सहयोग से प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल के प्रधान अध्यापकों का बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर संवेदीकरण किया गया। अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (एसीएमओ-आरसीएच) डा. प्रवीण शर्मा ने एनएच-9 स्थित जेएमएस वर्ल्ड स्कूल के सभागार में हापुड़ ब्लॉक के करीब 300 प्रधान अध्यापकों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय बाल/ किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके/आरकेएसके) के बारे में बताया और अध्यापकों से बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए आव्हान किया कि इस कार्यक्रम के बारे बच्चों और उनके अभिभावकों को बताएं। उन्होंने छात्राओं को माहवारी के दौरान सेनेटरी नेपकिन का उपयोग करने और आरबीएसके के अंतर्गत एनीमिया से बचाव के लिए पिंक और ब्लू गोली के बारे में बताया। यह गोली छात्राओं को हर सोमवार को दी जानी है। इसके अलावा उन्होंने पेट के कीड़े (कृमि) निकालने वाली गोली (एलबेंडाजोल) वर्ष में दो बार खिलाने की महत्ता पर प्रकाश डाला ताकि प्रधान अध्यापक छात्रों का संवेदीकरण कर सकें और छात्र- छात्राएं राष्टीय बाल/ किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम का लाभ उठा सकें। एबीएसए रचना गुप्ता ने प्रधान अध्यापकों को संबोधित करते हुए कहा – आरबीएसके का लाभ हमारे सभी छात्र-छात्राओं को मिल सके, इसके लिए खुद भी जागरूक हों और बच्चों व अभिभावकों को भी जागरूक करें।
आरबीएसके के डीईआईसी मैनेजर डा. मयंक चौधरी ने बताया – आरबीएसके के तहत शून्य से 19 साल तक के बच्चों में जन्मजात दोषों की स्क्रीनिंग की जाती है। इसके लिए स्कूलों और आंगनबाड़ी केन्द्रों में शिविर भी लगाए जाते हैं। वहां से जो बच्चे जन्मजात दोषों से ग्रसित मिलते हैं, उन्हें उपचार के लिए संबंधित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र अथवा जिला सरकारी अस्पताल, राज्यस्तरीय अस्पताल में भेजा जाता है, जहां उनका निशुल्क उपचार होता है। आरबीएसके की टीमें टीबी और कुष्ठ रोग समेत 47 बीमारियों की स्क्रीनिंग करती हैं। इनमें पोषाहार में कमी से होने वाली बीमारियां, बच्चों की सामान्य बीमारियां, जन्मजात विकृतियां और विकास में देरी से उत्पन्न रोग शामिल हैं। जन्म से लेकर 6 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों का इलाज जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केन्द्र (डीईआईसी) पर किया जाता है, जबकि 6 से 18 वर्ष की आयु वर्ग का उपचार सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर किया जाता है।
जिला पीपीएम समन्वयक सुशील चौधरी ने प्रधान अध्यापकों को टीबी उन्मूलन कार्यक्रम की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया- दो सप्ताह से अधिक खांसी रहने, खांसी में बलगम या खून आने, वजन कम होने, थकान रहने, छाती में दर्द रहने, शाम के समय बुखार आने और रात में सोते समय पसीना आने पर टीबी की जांच की सलाह दी जाती है। जांच में टीबी की पुष्टि होने पर उपचार की व्यवस्था सरकार की ओर से की गई है। नियमित उपचार के बाद रोगी पूरी तरह ठीक हो जाता है। उपचार के दौरान निक्षय पोषण योजना के तहत रोगी को हर माह पांच सौ रुपए उसके बैंक खाते में दिए जाते हैं, यह राशि अच्छे पोषण के लिए होती है। उन्होंने प्रधान अध्यापकों से आव्हान किया कि टीबी उन्मूलन कार्यक्रम की जानकारी जन-जन तक चहुंचाने में क्षय रोग विभाग की मदद करें और 2025 तक क्षय रोग मुक्त भारत के निर्माण में सहयोगी बने।
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