
बड़े ही धूम धाम के साथ नाच गाकर मनाया गया श्री कृष्ण-रुकमणि जी का विवाह महोत्सव
विशेष संत आगमन :- स्वामी श्री शैलेषानंद जी महाराज (महामंडलेश्वर) , श्री विष्णुप्रियदास जी महाराज
हापुड़, सीमन (ehapurnews.com): हापुड़ के दिव्य धाम श्री बाला जी मन्दिर मे चल रही सप्त दिवसीय श्रीमद भागवत महाकथा के षष्ठम दिवस की कथा मे श्री बागेश्वर धाम से पधारे परम पूजनीय पं. रोहित रीछारीया जी महाराज ने षष्ठम दिवस की। कथा में श्री कृष्ण व रुकमणि के विवाह के उत्सव पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर सर्वप्रथम कथा आयोजक स्वामी श्री अशोकांचार्य जी महाराज व स्वामी श्री यश्वर्धनाचार्य जी महाराज ने व्यास पीठ को पूजन, नमन व आरती करके षष्ठम दिवस की कथा को आरम्भ कराया, षष्ठम दिवस की कथा भक्तों को सुनाते हुए महाराज श्री रोहित जी महाराज ने बताया विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने भगवान श्री कृष्ण को मन ही मन पति मान लिया था और एक पत्र के माध्यम से विवाह का प्रस्ताव भेजा था। राजा भीष्मक की इच्छा के विरुद्ध, कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह किया और उनकी रक्षा की।
इस कथा में रुक्मिणी के प्रेम, भक्ति और कृष्ण के उनके हरण का वर्णन होता है, जिसे कथावाचक विस्तार से सुनाते हैं और भक्तगण आनंदित होते हैं। विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण के गुणों के बारे में सुनकर उन्हें अपना मन ही मन पति स्वीकार कर लिया था। रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के हाथों श्रीकृष्ण को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने अपने विवाह प्रस्ताव और कृष्ण से उन्हें लेकर जाने का आग्रह किया। रुक्मिणी ने पार्वती पूजा के लिए मंदिर जाते समय श्रीकृष्ण से उनसे हरण करने का आग्रह किया था। श्री कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया। उन्हें शिशुपाल जैसे दुष्ट राजा से बचाया और विधिपूर्वक उनका विवाह संपन्न किया। रुक्मिणी को साक्षात लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, और यह विवाह उनके और भगवान नारायण के अटूट बंधन को दर्शाता है।
रुकमणि का श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण और उनके प्रेम को इस प्रसंग से समझा जा सकता है, जो भक्तों को भक्ति का मार्ग दिखाता है। श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की झांकियां भी प्रस्तुत की जाती हैं और भक्तगण इस उत्सव में शामिल होकर आनंदित होते हैं। देवी रुक्मिणी विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री थीं। उनकी सुंदरता, बुद्धिमत्ता और सरलता की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उन्होंने देवर्षि नारद से भगवान कृष्ण के पराक्रम, सौंदर्य और गुणों के बारे में सुना और मन ही मन उन्हें अपना पति मान लिया, रुक्मिणी के बड़े भाई रुक्मी, जो शिशुपाल के मित्र थे, अपनी बहन का विवाह चेदि नरेश शिशुपाल से कराना चाहते थे। रुक्मिणी इस विवाह के लिए तैयार नहीं थीं और उन्होंने निश्चय किया कि अगर उनका विवाह कृष्ण से नहीं हुआ, तो वह अपने प्राण त्याग देंगी। , संकट की इस घड़ी में रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण सुदेव के हाथों भगवान कृष्ण को एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने अपने प्रेम का इजहार किया और कृष्ण से उन्हें शिशुपाल से विवाह करने से पहले हरण कर ले जाने का निवेदन किया। उन्होंने कृष्ण को बताया कि वह विवाह से पहले गिरिजा देवी के मंदिर में दर्शन के लिए जाएंगी और वहीं से वे उनका अपहरण कर सकते हैं। संदेश पाते ही कृष्ण बलराम के साथ विदर्भ पहुँचे। जब रुक्मिणी गिरिजा मंदिर से बाहर निकल रही थीं, तब कृष्ण ने उनका अपहरण कर लिया। यह देख शिशुपाल और रुक्मी ने कृष्ण का पीछा किया, लेकिन कृष्ण ने उनका सामना किया और रुक्मी को पराजित कर उसे अपमानित किया। इसके बाद कृष्ण रुक्मिणी को लेकर द्वारका लौट आए और वहाँ विधि-विधान से उनसे विवाह किया। रुक्मिणी विवाह का उत्सव केवल एक कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि भक्ति और समर्पण के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब प्रेम सच्चा और भक्ति अटल हो, तो स्वयं भगवान उसे सफल बनाने के लिए आते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस उत्सव में भाग लेने से भक्तों की वैवाहिक परेशानियाँ दूर होती हैं। इस अवसर पर प्रिंस गोयल,आरती गोयल,नेहा गोयल,पं सूरज,रजत,यश,संजीव,हर्ष शर्मा,योगेंद्र ,शिवम , देवेंद्र,दीपक,तरुण,प्रिंस, कपिल गोयल, सुशील, संजीव वर्मा,नीलम,अनिता गोयल, मिनाक्षी, श्रीमति, प्रीति शर्मा अर्चना, अलका, आरती, पूजा, शशि सहित सैकडो की संख्या मे भक्त जन उपस्थित रहे!

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