हापुड़, सीमन (ehapurnews.com) : महाशिवरात्रि पर्व पर शिवभक्तों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और महादेव का जलाभिषेक किया। इस पर्व पर कावड़िये ब्रजघाट, हरिद्वार से जल लेकर आए। वैसे तो कांवड़ तीन प्रकार की होती है। दांडी कांवड़, खड़ी कांवड़ और डाक कांवड़… यहां हम आपको डाक कांवड़ के बारे में बता रहे हैं। दरअसल डाक कांवड़ को उठाने से पहले कई नियमों का पालन करना पड़ता है और संकल्प लेना पड़ता है। डाक कांवड़ वैसे तो झांकी वाली कांवड़ जैसी ही होती है जिसमें गाड़ी में भोलेनाथ की प्रतिमा को सजाकर रखा जाता है।
शिवरात्रि से कुछ दिन पहले कावड़िया का हरिद्वार के लिए प्रस्थान होता है। हरिद्वार में स्नान और पूजा करने के बाद कांवड़िये संकल्प के साथ गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चलते हैं। डाक कांवड़ में अधिकतर 15-20 शिवभक्त होते हैं जिनमें से एक केसरी कपड़े में गंगाजल लेकर दौड़ता हैं। जब यह शिव भक्त थक जाता है तो दूसरों को इशारा करता है जिसके बाद अन्य शिव भक्तों में से एक भागता हुआ हाथों में जल लेकर आगे की ओर रवाना होता है। डाक कांवड़ कभी भी रुकती नहीं है। डाक कांवड़ के दौरान कुछ भोले बाइकों पर तो कुछ वाहन में सवार रहते हैं और शिवरात्रि पर्व पर भोले का जलाभिषेक करते हैं।
कहा जाता है कि महादेव को सावन का महीने सबसे प्रिय है। मान्यता है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कावड़ यात्रा की शुरुआत की थी। वही सबसे पहले कावड़िये थे जिन्होंने सुल्तानगंज से कावड़ में गंगाजल लाकर बाबाधआम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था।

























