
हापुड़, सीमन (ehapurnews.com): इस बाऱ जन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र के क्षय होने से व्रत के संबंध में उत्पन्न संशय को दूर करते हुए भारतीय ज्योतिष कर्मकांड महासभा विद्वानों ने श्री कृष्णजन्माष्टमी व्रत के सम्बन्ध में निर्णय सिंधु, श्रीमद भागवत, धर्म सिंधु, स्कन्द पुराण, भविष्य पुराण सहित अन्य धर्मग्रंथों का प्रमाण देते हुए निर्णय दिया कि अष्टमी तिथि प्रधान मानने वाले समस्त कृष्णभक्त 15 अगस्त को व्रत रखेंगे जबकि नक्षत्र प्रधान वाले भक्त 16 अगस्त को पूजन कर जन्मोत्सव मनाएंगे। महासभा अध्यक्ष ज्योतिर्विद पंडित के० सी० पाण्डेय काशी वाले ने बताया कि इस बाऱ अष्टमी तिथि 15 अगस्त की रात्रि 11.50 से प्रारम्भ होकर 16 अगस्त की रात्रि 9.34 तक रहेगी अर्थात् 16 की अर्धरात्रि से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी तथा रोहिणी नक्षत्र 17 अगस्त को सुबह 4.38 से शुरु होगा। 15 अगस्त और 16 अगस्त दोनों दिन व रात रोहिणी नक्षत्र नहीं है। अर्थात् रोहिणी नक्षत्र क्षय है। इस स्थिति में निर्णय सिंधु के अनुसार स्पष्ट प्रमाण मत है कि श्लोक – दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्ति चेद्रोहिणी कला। रात्रियुक्तां प्रकुर्वीत विशेषेणेन्दुसंयुताम् ।। अर्थात् यदि जन्माष्टमी व्रत में अष्टमी के साथ यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेष कर चन्द्रमा से मिली हुई अष्टमी की रात्रि में व्रत पूजन करे 15 अगस्त को चन्द्रोदय रात्रि 10.44 पर होगा और चंद्रास्त 16 की दोपहर 12.59 पर होगा। पुनः उदय 16 अगस्त की रात्रि 11.29 पर होगा लेकिन उसके पूर्व ही अष्टमी तिथि समाप्त हो जाएगी अर्थात् 15 अगस्त की रात्रि में अष्टमी के साथ चन्द्रोदय है लेकिन 16 अगस्त को नहीं है। इसलिए इस बाऱ 15 अगस्त को व्रत करना ही शास्त्र सम्मत है। 16 को पूजन कर जन्मोत्सव मनाएं। महासभा संरक्षक डॉ० वासुदेव शर्मा ने माधवीय मत का प्रमाण देते हुए कहा कि अष्टमी शिवरात्रिश्च ह्यर्धरात्रादधो यदि। दृश्यते घटिका या सा पूर्वविद्धा प्रकीर्तिता ।। अर्थात् जन्माष्टमी एवं शिवरात्रि मध्यरात्रि (निशीथकालीन) पर्व है। इस अनुसार यदि आधी रात के बाद एक घड़ी (24 मिनट) भी अष्टमी तिथि प्राप्त हो उसी को ग्रहण करना चाहिए। 15 अगस्त को अष्टमी अर्धरात्रि से पूर्व चन्द्रोदय के साथ प्रारम्भ होकर बाद में पूरी रात व्याप्त है। अतः गृहस्थों को इसी दिन व्रत करना सही रहेगा। वैष्णव जन परम्परानुसार जन्मोत्सव 16 अगस्त को मनाएंगे आचार्य देवी प्रसाद तिवारी एवं आचार्य गौरव कौशिक ने कहा कि भगवान भोलेनाथ का पर्व शिवरात्रि, भगवान राम का जन्म रामनवमी तथा भगवान श्री कृष्ण का जन्म जन्माष्टमी तीनों ही कर्मकाल तिथि प्रधान पर्व है जिस प्रकार चैत्र शुक्ल पक्ष मध्यान्ह (दोपहर) में प्राप्त नवमी तिथि ही रामनवमी होता है। उसी प्रकार जन्माष्टमी में अर्धरात्रि (निशीथकाल) में प्राप्त कृष्ण पक्ष अष्टमी ही कृष्णाष्टमी अर्थात् जन्माष्टमी होती है। उसी दिन व्रत करना चाहिए 15 अगस्त को अर्धरात्रि में अष्टमीतिथि है लेकिन 16 अगस्त को अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों नहीं है। माधवीय में लिखा है कि अष्टमी और शिवरात्री आधी रात से पहले घड़ी भर भी हो तो लेना चाहिए। अतः जन्माष्टमी 15 अगस्त को सही है। भगवान कृष्ण के प्रमुख राधाभल्लभ मंदिर ( माहेश्वरी मंदिर ) के मुख्य पुजारी पंडित नकुलदेव मिश्रा ने बताया कि 15 और 16 दोनों दिन पूजन किया जायेगा। व्रत पर्व विधिज्ञा विदुषी अनिशा सोनी पाण्डेय ने कहा कि धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का जन्म भादों मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में बुधवार मध्यरात्रि (निशीथकाल) में हुआ था। इस बाऱ अष्टमी तिथि को छोड़कर अन्य कोई भी संयोग रात्रि में नहीं बन रहा है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बालरूप का पूजन करना चाहिए, कान्हा जी को पीला व नीला रंग बहुत प्रिय है, भगवान को मोरपँख युक्त मुकुट के साथ अत्यंत प्रिय बांसुरी भी अवश्य भेंट करें तथा मिश्रीयुक्त माखन का भोग लगाना चाहिए अन्य सफ़ेद व पीले रंग के मिष्ठान का भोग भी अर्पित करें तथा तुलसी पत्र अवश्य चढ़ाएं निर्णय में परामर्श मंडल विद्वान पंडित ओमप्रकाश पोखरियाल, मंत्री आचार्य देवी प्रसाद तिवारी, समन्वयक पंडित अजय पाण्डेय, मिडिया प्रभारी एस्ट्रो धर्मेन्द्र बंसल, प्रवक्ता पंडित आशीष पोखरियाल, पंडित गौरव कौशिक आदि विद्वान सम्मिलित रहे।
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